इतने दिनों तक अपनी अनुपस्थिति के लिए माफ़ी चाहती हूँ ।
अधिकतर समय कविताओं के साथ गुज़र रहा है। एक कविता संग्रह बनाने की कोशिश कर रही हूँ। जल्द ही आपको मेरी रचनाओं पर टिप्पणी करनी होगी। आपका साथ रहा तो, आशा है कि संग्रह जल्द ही पूरा कर लूंगी ।
सहसा..बैठे-बैठे कुछ पंक्तियाँ मेरी ज़हन में आई ..
तुझे है याद.. कश्ती डूबती थी जब किनारे पे,
समंदर की लहर में पांव अपना रोज़ धोते थे,
न बाती थी, न बाती में थी लौ जलती किनारे पे,
अँधेरा मौन था इतना, मगर बस साथ तेरा था ।
...ऋतु की कलम से
५.११.2009
जल्द ही अपनी नयी रचनायों के साथ आऊंगी ।
शुभकामनाएं व शांति
ऋतु सिंह
इस गगन चलूँ, उस गगन चलूँ, मैं जीवन हूँ, न सहम चलूँ, पग-पग पर कांटें बिछे पड़े, सहते-सहते हर कदम चलूँ | बचपन न देखा है मैंने, न हि किशोरी का बल ही मिला, निर्भय होकर न चल ही सकूँ, न नव-युवती जीवन ही मिला | रग-रग में आग ही लपटें हैं, पग-पग पथरीली राहें हैं, टूटी-फूटी सी सड़कों पर, रोती माओं की आहें हैं | जीवित हूँ, हूँ पर निर्जर सी, सांसें हैं, वो पर आंहें हैं, सकुचाई सी, घबराई सी, धूमिल-धुसरित सी राहें हैं | शीशे के सपने लिए हुए, न इधर चलूँ, न उधर चलूँ, न घबराऊँ, न सकुचाऊँ, न रहम सहूँ, न रसम सहूँ | इक नया सवेरा लायी हूँ, नित नए ज्ञान का कंपन है, मस्तक न झुकनेवाला है, ये मानवता का 'मंथन है' | ...ऋतु की कलम से
b'ful xpressions nd creation!! i cn c the pain nd love hidden in these lines!!!!
ReplyDeleteऋतु दीदी
ReplyDeleteऋतु अवस्थी जी का ब्लॉग http://www.rituondnet.blogspot.com/ खोजते हुए आपका ब्लॉग देखा... अच्छा लगा ... मैं भी ब्लॉग लिखना चाहती हू .
sundar
ReplyDeleteNice. Liked it very much ...
ReplyDeletehey, nice blog!!! gud poetic sense.
ReplyDeleteby the way ur website ivibgyor is also pretty cool... i really liked the layout and content. if get something 2 develop thn i'll surely call u :)
बढ़िया लिखा आपने.. पहली बार आपके ब्लॉग पर आया हूँ.. अच्छा लगा..
ReplyDeleteआप अपने ब्लॉग पर Follower नामक विजेट क्यों नहीं लगा लेती हैं, उससे भविष्य में आपका ब्लॉग ढूँढने में आसानी हो जायेगी.