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शिवोहम

एक मुनि की एक कुटी में,
स्वर गुंजित, अक्षत चन्दन से,
तिलक सुशोभित भौं मध्य में,
शिव-त्रिशूल, भंगम, भभूत से ||

चन्द्र जटा में शीतल बैठा,
गंगा की धरा जो बहती,
सर्प थिरकता कुंडली साधे,
एक मूल पर कितने धागे ||

भौं-भंगिमा तनी-तनी है,
है ललाट पर शीतल काया,
तीन नेत्र में क्रोध की अग्नि,
सहसा तन पर भस्म रमाया ||

कहत रहीम सुनो भाई साधो,
शिव ही सुन्दर, शिव शक्ति है,
परम धीर, पौरुष का साधक,
शिव स्वरुप, शिव ही भक्ति है ||

...ऋतु की कलम से

Comments

  1. कहत रहीम सुनो भाई साधो,
    शिव ही सुन्दर, शिव शक्ति है,
    परम धीर, पौरुष का साधक,
    शिव स्वरुप, शिव ही भक्ति है

    bahut sundar bhav

    http://sanjaykuamr.blogspot.com/

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  2. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी रचना 28 - 9 - 2010 मंगलवार को ली गयी है ...
    कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया

    http://charchamanch.blogspot.com/

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  3. बहुत सुन्दर भावों से सजी रचना ..

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  4. कहत रहीम सुनो भाई साधो,
    शिव ही सुन्दर, शिव शक्ति है,
    परम धीर, पौरुष का साधक,
    शिव स्वरुप, शिव ही भक्ति है ||

    ॐ नम: शिवाय
    सत्यम शिवम् सुन्दरम
    आपकी रचना की तरह

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  5. बेहतरीन रचना! ॐ नम: शिवाय..

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  6. संगीता जी... हमें चर्चा मंच पर एक आधार देने के लिए तहे-दिल से शुक्रिया. आपकी मेहनत दिख रही है.. प्रतिभा को कैसे उजागर करते हैं, ये कोई आपसे सीखे.
    धन्यवाद स्वीकार करें.
    ऋतु.

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  7. ऐसी कवितायें रोज रोज पढने को नहीं मिलती...इतनी भावपूर्ण कवितायें लिखने के लिए आप को बधाई...शब्द शब्द दिल में उतर गयी.

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  8. ऋतु आप काफी अच्छा लिखती हैं और आशा हैं आप इसी तरह और सुंदर कविताये आगे भी लिखती रहेंगी ...


    चरण सिन्हा

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