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'खुद का निर्माण मैं करता हूँ'

मन की अग्नि, विस्तृत है जल, तन समाधीन को तरसा है, कभी उहा -पोह, मन का है द्वेष, जिस दुविधा में तू भटका है, एक तिलक लहू का माथे पे, एक केश बंधा, शिव की जटा, दुर्बल, मायूस खड़ा होकर, तू क्यूँ है, जर्जर नीरस सा, आवेग न क्यूँ, आवेश न क्यूँ, चला मंद-मंद मुस्काता सा, किसकी किस्मत पे हँसता है, अपना ही हास तू करता है, एक तेज है माथे पर उभरा, एक श्वास में आग की लपटे हैं, है पथविहीन ये सीमाएं, टूटे-फूटे से रस्ते हैं, मैं चला वहां तू देख ज़रा, खुद का निर्माण मैं करता हूँ, वो माटी की मूरत से खुद, अपना इतिहास मैं रचता हूँ, मन की करुणा, तन का आवेग, सृष्टि की रचना कर देगा, सहसा आँचल का धागा ही, जीवन परिवर्तित कर देगा, इस मूक अवस्था में मेरी, रचनायें कटु लगे एक क्षण, वह भी अब मुझसे दूर नहीं, जिसका इतिहास मैं रचता हूँ, मैं चला वहीँ तू देख जहाँ, खुद की रचना मैं करता हूँ, अब पाप-पुण्य का ज्ञान नहीं, अब अकस्मात् ही ठहर गया, जब ठहरा तो, मैंने पाया, कड़ियाँ हाथों में बंधी पड़ी, निर्जल शरीर में कम्पन थी, अज्ञात से डर की सिहरन थी, जब निद्रा से मैं जागा हूँ, आँखें अंधियारी लगती हैं, कानों में कोई सुर न तान,...

श्यामल स्मृति

समेटी चाँद की किरणे, बिखेरी सुरमई सुबह, सनी आलाप में आवाज़, घनी थी बादलों की साज़, सजाई सपनो की दुनिया, चला मैं फासलों के साथ, छिटकते कण मेरी साँसों के, श्यामल थी मेरी आवाज़ | करों में थाम के सपने, उरों में बाँध आशाएं, चला मैं बादलों के साथ, थमा मैं बादलों के साथ, कड़ी एक स्नेह की, रोके खड़ी, मुझको है हर-पल-क्षण, रुका मैं आँधियों से और चला मैं आँधियों के साथ | तटों पे आके लहरें, आती हैं, रुक जाती एक पल को, मुझे आभास क्यूँ होता है तेरे साथ होने का, चुरायी याद की परतें, मेरी पूछे बिना मुझ बिन, कुरेदी प्रेम की पाती, लिखी जो तारे हर पल गिन | मेरे कमरे में कलमों की है इक गट्ठर अँधेरे में, है पन्नो में तेरे शब्दों की मदमस्ती अँधेरे में, सहेजी उसकी दृष्टि, अपनी दृष्टि में न जाने कब, वो मेरे साथ आ पहुंची, जो तेरे साथ थी एक दिन | तेरी परछाई भी मेरा पता क्यूँ खोज लेती है, तेरे आने का अंदेसा मुझे हर रोज़ देती है, झरोखे से मैं तुझको देखता हूँ बंद आँखों से, भुलाना चाहूं भी तो याद तेरी आ ही जाती है | ...ऋतु की कलम से

युगांतर

विभक्ति प्रेम की और द्वेष श्यामल है अँधेरे में, तनी आवाज़, नैतिकता, समाहित मन के घेरे में, चवन्नी आठ, कंचा पाँच, लेके चल पड़ा इक दिन, फटी थी जेब, उसमे हाथ, चवन्नी था रहा मैं गिन | किनारा था सड़क का, और मेरे पास एक डिबिया, थी उसमे बंद माँ की आस, थे कुछ सपने मेरे कुछ ख़ास, मैं चलते-चलते न जाने, सिसक उठता था अनजाने, मैं कहता था वो लौटेगा, वो कहती थी, न जाने कब, मैं कहता था कि शायद प्रेम का आभास होगा तब, पहाड़ी पर खड़ा मैं बंद आँखों से हथेली में, उठा लाया, वो रिश्ते, जो थी, बीती इक पहेली में, उठा अपना मैं झोला, खोजता था खत् पिताजी का, जो भीगी थी अभी तक, और सिलवट पाँच थी उसमे | मैं अपनी लेखनी को दे रहा आवाज़ उनकी आज, सघन बदल भिगोता है अचानक तन को मेरे आज, कोई सुन ले मेरे क़दमों की खामोशी,  मेरी आँगन की तुलसी, और मेरी लेखनी का राज़, सिसकते और सिमटते रास्ते ने, दी मुझे आवाज़, मेरी आँगन की तुलसी और मेरी लेखनी का राज़ | ...ऋतु की कलम से  

शिवोहम

एक मुनि की एक कुटी में , स्वर गुंजित , अक्षत चन्दन से , तिलक सुशोभित भौं मध्य में , शिव-त्रिशूल , भंगम , भभूत से || चन्द्र जटा में शीतल बैठा , गंगा की धरा जो बहती , सर्प थिरकता कुंडली साधे , एक मूल पर कितने धागे || भौं-भंगिमा तनी-तनी है , है ललाट पर शीतल काया , तीन नेत्र में क्रोध की अग्नि , सहसा तन पर भस्म रमाया || कहत रहीम सुनो भाई साधो , शिव ही सुन्दर , शिव शक्ति है , परम धीर , पौरुष का साधक , शिव स्वरुप , शिव ही भक्ति है || ... ऋतु की कलम से

'रंगमंच'

त्रुटियों के पन्ने रोज़ पलटते रहते हैं, तृष्णा मन की व्याकुल गाथा कह जाती है, प्रतिपल मैं सोचूं, है छोटी सी यह सृष्टि, सागर में भी आकाश दिखाई देता है | है भाग्य मसीहा, सोच-सोच इतराऊँ मैं, संछिप्त कहूं या सदियाँ इसमें पाऊँ मैं, है रंगमंच जीवित कितना भड़कीला सा, निर्जीव-सजीव सा अपना पत्र निभाऊं मैं | ऋतु की कलम से..

शुभकामनाएं व शांति

इतने दिनों तक अपनी अनुपस्थिति के लिए माफ़ी चाहती हूँ । अधिकतर समय कविताओं के साथ गुज़र रहा है। एक कविता संग्रह बनाने की कोशिश कर रही हूँ। जल्द ही आपको मेरी रचनाओं पर टिप्पणी करनी होगी। आपका साथ रहा तो, आशा है कि संग्रह जल्द ही पूरा कर लूंगी । सहसा..बैठे-बैठे कुछ पंक्तियाँ मेरी ज़हन में आई .. तुझे है याद.. कश्ती डूबती थी जब किनारे पे, समंदर की लहर में पांव अपना रोज़ धोते थे, न बाती थी, न बाती में थी लौ जलती किनारे पे, अँधेरा मौन था इतना, मगर बस साथ तेरा था । ...ऋतु की कलम से ५.११.2009 जल्द ही अपनी नयी रचनायों के साथ आऊंगी । शुभकामनाएं व शांति ऋतु सिंह

कवि महोदय

सुनिए मैं एक कहानी सुनाता हूँ, एक व्यक्ति, जिसके गुण मैं कभी न गाता हूँ एक दिन मेरे पास वो आया, बोला - " सुनिए मैं आपके लिए कुछ लाया " बड़े ही प्रेम से मैंने उससे सवाल किया, "क्यों भई, मेरे लिए तुम्हें ऐसा क्या मिल गया ? " उसने कहा - हुजूर ! एक कविता सुनाता हूँ, फिर तोहफा बाद में दिखाता हूँ मैंने कहा - " फरमाइए ! " उसने कहाँ - " ज़रा करीब तो आइये ! " तो हुज़ूर, कविता कुछ इस प्रकार थी, हिंदी में ही, किन्तु एक तलवार थी नेताजी ने बड़े प्रेम से, छोटू को बुलवाया, बोले - " भाई ये रुपये लो, इसे गाँव के गरीबों में बाँट दो, कुछ कम्बल जो बचे हैं, पिछले साल से रखे हैं, इसे भी ले जाओ, गरीबों में बाँट आओ " लाखों पोस्टरें छपवाओ, मेरा हैण्डसम सा फोटो लगवाओ, उसमे ये ज़रूर छपवाना, अब तो सभी पाएँगे दाना ही दाना, नोटों की बौछार होगी, खुशियाँ अपार होंगी, प्याज और आलू तो सस्ता बिकेगा, अब मंहगाई को कौन पूछेगा ? कल ही एक बिल्डर बुलवाओ, पासवाली नदी पर एक पुल बनवाओ, सेक्रेटरी ने पूछा - " क्या नेताजी ! क्या बात है ? पहले तो हमेशा ही गरजते थे, ये कैसी बरसात...

न जाने कहाँ.. खो सी गयी!

संजो के रखा था कुछ पन्नों को, पलट के देखा तो सिमटी हुई तस्वीर दिखी, चली जो एक सांस मेरी, उठा एक बवंडर जाने कैसे, धुआं उठा मेरी आँखों से, एक तस्वीर बनी सिमटी हुई सी... सहसा न जाने कहाँ खो सी गयी, आँसुओं की बारी जो आई... घिसटते पाँव से अधरों पे गिरी, सहसा... न जाने खो सी गयी, न जाने कहाँ... खो सी गयी !!! ...ऋतु की कलम से

आपकी कोशिशों का स्वागत है|

तकिये के नीचे पड़ी थी एक किताब,पन्ने बिखरे थे,शब्द सिसकियाँ ले रहे थे॥ कलम का एक कोना झाँक रहा था॥ उसकी खड़खड़ाहट कानो में शोर मचा रही थी और स्याही की छीटें तकिए को भिगो चुकी थी॥ रंग नहीं था उनमे, लेकिन एक आवेश था, एक उत्तेजना थी॥ रुकना तो सीखा ही नहीं था ... कलम जो थी॥ ... ऋतु की कलम से